10 साल में लोकसभा और विधानसभा के 80 से ज्यादा चुनाव हारने के बाद ओल्ड ग्रैंड कांग्रेस एक और नया प्रयोग करने जा रही है. खासकर राहुल गांधी और उनकी टीम. कांग्रेस ने अपने जिलाध्यक्षों को पावरफुल बनाने का प्लान तैयार किया है. इसके तहत जिलाध्यक्षों को टिकट वितरण में तवज्जो दी जाएगी.
कांग्रेस मुख्यालय में 2 दिन पहले हुई एक बैठक में राहुल गांधी ने कहा कि जब तक जिलाध्यक्ष मजबूत नहीं होंगे, तब तक कांग्रेस का उत्थान नहीं हो सकता है. दिलचस्प बात है कि जिन जिलाध्यक्षों को राहुल गांधी शक्ति देने के पक्ष में है, कांग्रेस संगठन में उनकी स्थिति काफी खराब है.
देश के करीब 150 जिले में वर्तमान में कांग्रेस के पास कोई अध्यक्ष नहीं है. इनमें महाराष्ट्र, झारखंड और बंगाल के साथ-साथ हरियाणा और राजधानी दिल्ली के जिले प्रमुख रूप से शामिल हैं.
हरियाणा में 22 जिले, यहां सालों से पद रिक्त
हरियाणा को कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है. 2004 से 2014 तक यहां कांग्रेस की सरकार रही है, लेकिन हरियाणा में सालों से कांग्रेस के पास जिलाध्यक्ष नहीं हैं. हरियाणा में कुल 22 जिले हैं.
कांग्रेस के संगठन में इन 22 जिलों को 25 में विभाजित किया गया है, लेकिन पार्टी ने अब तक एक भी जिले में अध्यक्षों की नियुक्ति नहीं की है. 2024 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के भीतर जिलाध्यक्षों की नियुक्ति की सुगबुगाहट तेज थी, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाई.
हरियाणा में कांग्रेस हार के बाद से प्रदेश अध्यक्ष और सीएलपी नेता तक नियुक्त नहीं कर पाई है.
बंगाल में 23 जिले, यहां भी अध्यक्ष नहीं
पश्चिम बंगाल में 23 जिले हैं. कांग्रेस संगठन में इन जिलों को 30 कैटेगरी में बांटा गया है. पार्टी एक वक्त बंगाल में मुख्य विपक्षी की भूमिका में रही है, लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद से यहां कांग्रेस की स्थिति काफी खराब है.
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने अधीर रंजन चौधरी को हटाकर शुभांकर सरकार को बंगाल की जिम्मेदारी सौंपी, लेकिन 6 महीना बीत जाने के बाद भी सरकार अपनी नई टीम नहीं बना पाए हैं.
बंगाल में कांग्रेस अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि उसे किस तरफ जाना है. एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का ममता बनर्जी के साथ गठबंधन है, लेकिन दूसरी तरफ बंगाल में ममता कांग्रेस को भाव देने के मूड में नहीं है.
राजधानी दिल्ली का हाल तो और भी बेहाल
कांग्रेस का मुख्यालय दिल्ली में है और बड़े नेता भी यहीं बैठते हैं, लेकिन राजधानी दिल्ली में भी सालों से कांग्रेस के पास जिलाध्यक्ष नहीं है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 7 जिले हैं. जिलाध्यक्ष तो दूर की बात कांग्रेस के पास राष्ट्रीय राजधानी में पर्मानेंट अध्यक्ष तक नहीं है.
दिल्ली में लोकसभा की 7 और विधानसभा की 70 सीटें हैं. कांग्रेस पिछले 3 चुनाव से यहां जीरो पर सिमट जा रही है.
ओडिशा में भी एक साल से नियुक्ति नहीं
2024 के चुनाव में हार के बाद कांग्रेस ने ओडिशा की पूरी टीम को भंग कर दिया था. कुछ महीने पहले कांग्रेस ने यहां भक्तचरण दास को अध्यक्ष बनाकर भेजा है, लेकिन दास अब तक अपनी टीम नहीं बना पाए हैं.
ओडिशा में प्रशासनिक तौर पर 30 जिले हैं. कांग्रेस के संगठन के लिहाज से इन जिलों को 40 डिस्ट्रिक्ट में विभाजित किया गया है, लेकिन इन जिलों को अभी तक अपना नेता नहीं मिल पाया है.
ओडिशा में 30 साल से ज्यादा समय से कांग्रेस सत्ता में नहीं है.
झारखंड में सत्ता फिर भी यहां जिलाध्यक्ष नहीं
झारखंड में कांग्रेस गठबंधन के साथ सरकार में है, लेकिन इसके बावजूद यहां पर लंबे वक्त से जिलाध्यक्षों की नियुक्ति नहीं हुई है. चुनाव से पहले कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष बदले थे, जिसके बाद सभी जिले में अध्यक्षों के बदलाव की भी बात चली थी, लेकिन फाइनल ऐलान नहीं हो पाया.
आदिवासी बहुल झारखंड में 24 जिले हैं. यहां अध्यक्षों की नियुक्ति करना पार्टी के लिए आसान काम नहीं है.
महाराष्ट्र में भी जिलाध्यक्षों की लिस्ट पेंडिंग
2024 के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस ने नाना पटोले को प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटा दिया, लेकिन पार्टी अब तक यहां जिलाध्यक्षों की नियुक्ति नहीं कर पाई है. महाराष्ट्र में प्रशासनिक तौर पर 36 जिले हैं.
काम को आसान बनाने के लिए कांग्रेस ने इन 36 जिलों को 45 में विभाजित कर रखा है.